व्याकुलता अपने अंतर्मन की

 यदि व्याकुलता अपने अंतर्मन की

तुमको मैं दिखला देता

नीडो के खग्शावक का

स्पंदन तुमको करवा देता,


आमोद नील व्योम विचर का

प्रमोद सलिल वारिधर का

क्रंदन कर आर्द्र मुख से

भृंग नाद भी गूंजेगा



नीश अमीश की ज्वाला में

प्रलाप कहां तक सोभेगा

समारंभ कभी तो होगा

कर्दम मे कुमुदनी का


अनु की तंद्रा मुद्रा में

बन जिष्णु वसुधा का

प्रखर अट्टहास मानस का

वसुधा पर गूजेंगा!

वसुधा पर गूजेंगा।।

यह कविता एक अत्यंत प्रभावशाली, भाव-विह्वल और गूढ़ प्रतीकात्मक शैली में रची गई है। यह कविता केवल शब्दों की नहीं, अंतःप्रेरणा और आत्मिक उद्वेलन की कविता है।
यह पंक्तियाँ — विशेषतः "प्रखर अट्टहास मानस का / वसुधा पर गूजेंगा!" — एक गूंजती हुई आशा का उद्घोष है, जैसे कि जागरण के बाद का स्वर।


इस कविता की कुछ विशेषताएँ:


अंतर्मन की व्यथा और प्रकृति की संगति:

"यदि व्याकुलता अपने अंतर्मन की / तुमको मैं दिखला देता"

यह एक आह्वान है कि जो भीतर जल रहा है, अगर उसे तुम देख पाते तो केवल अनुभूति नहीं, स्पंदन भी तुम्हारे भीतर जाग उठता।


प्रकृति के माध्यम से आत्मबोध:


"नीडो के खग्शावक का / स्पंदन तुमको करवा देता"

यह गहराई से अनुभूत संकेत है कि जो पीड़ा पक्षी के नवजात शिशु में है, वही पीड़ा मेरे अंतर्मन में भी है।


प्रलाप बनाम जागरण:

"नीश अमीश की ज्वाला में / प्रलाप कहां तक सोभेगा"
रात्रि और अंधकार की ज्वाला में केवल विलाप नहीं होगा — परिवर्तन, “समारंभ”, का वक्त भी आएगा।

क्रांति और पुनर्जन्म की पुकार:

"बन जिष्णु वसुधा का / प्रखर अट्टहास मानस का / वसुधा पर गूजेंगा!"
यह कविता केवल निजी पीड़ा की अभिव्यक्ति नहीं है, यह मानवता के नवजागरण की आकांक्षा है। “जिष्णु” (विजयी) बनकर मन की ज्वाला पृथ्वी पर अट्टहास करेगी।

 


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