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Showing posts from June, 2025

व्याकुलता अपने अंतर्मन की

  यदि व्याकुलता अपने अंतर्मन की तुमको मैं दिखला देता नीडो के खग्शावक का स्पंदन तुमको करवा देता, आमोद नील व्योम विचर का प्रमोद सलिल वारिधर का क्रंदन कर आर्द्र मुख से भृंग नाद भी गूंजेगा नीश अमीश की ज्वाला में प्रलाप कहां तक सोभेगा समारंभ कभी तो होगा कर्दम मे कुमुदनी का अनु की तंद्रा मुद्रा में बन जिष्णु वसुधा का प्रखर अट्टहास मानस का वसुधा पर गूजेंगा! वसुधा पर गूजेंगा।। यह कविता एक अत्यंत प्रभावशाली, भाव-विह्वल और गूढ़ प्रतीकात्मक शैली में रची गई है। यह कविता केवल शब्दों की नहीं, अंतःप्रेरणा और आत्मिक उद्वेलन की कविता है। यह पंक्तियाँ — विशेषतः "प्रखर अट्टहास मानस का / वसुधा पर गूजेंगा!" — एक गूंजती हुई आशा का उद्घोष है, जैसे कि जागरण के बाद का स्वर । इस कविता की कुछ विशेषताएँ: अंतर्मन की व्यथा और प्रकृति की संगति: "यदि व्याकुलता अपने अंतर्मन की / तुमको मैं दिखला देता" यह एक आह्वान है कि जो भीतर जल रहा है, अगर उसे तुम देख पाते तो केवल अनुभूति नहीं, स्पंदन भी तुम्हारे भीतर जाग उठता। प्रकृति के माध्यम से आत्मबोध: "नीडो के खग्शावक का / स्पंदन तुमको करवा देता...

“कर शिला दीक्षित पथ” लेखक: उत्कर्ष दुबे

  कर शिला दीक्षित पथ आभार मेरा,ऋतुसमंत   मन, मनीषी कल्पो से तांडव करती निर्तरत काया व्योम रचित दृश्यों में समतुल्य विभाजन किसका है चेतना या महाभूतो का जो हो चेतना इन महभूतों में कर शिला दीक्षित पथ आभार मेरा, ऋतुसमंत आओ बैठो, मैं मृत्यु सिखाता हूं कर शिला दीक्षित पथ, आभार मेरा, ऋतुसमंत” — यह कोई सामान्य कथन नहीं, बल्कि एक गूढ़ आत्मस्वीकृति है। यह वाक्य मृत्यु, चेतना और प्रकृति के बीच चलने वाले एक अंतरंग संवाद का उद्घोष है, जिसमें आत्मा न केवल प्रश्न पूछती है, बल्कि स्वयं उत्तर भी बन जाती है। यह कविता आत्मबोध की उस सीमा पर खड़ी है, जहाँ व्यक्ति मृत्यु को भय नहीं, बल्कि विद्या मानता है — और स्वयं को उसका आचार्य । चेतना और महाभूतों के बीच का द्वंद्व कविता में एक केंद्रीय प्रश्न उभरता है: “समतुल्य विभाजन किसका है — चेतना या महाभूतों का?” यह प्रश्न न केवल भौतिक और आध्यात्मिक संसार के बीच की खाई को उजागर करता है, बल्कि उस विभाजन की वैधता को भी चुनौती देता है। यदि पाँच महाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — जड़ हैं, तो उनमें गति और निर्माण किसकी प्रेरणा से है? उत्तर केवल यही...